कौन

 बर्फ के मानिंद सफेद चेहरों पर
स्याह लब़ों से फूटती आहों में
जो दर्द बयां होता है
उसे समझ सका कौन?

ज़मीं पर खुन की स्याही से
मुल्क में अमन-चैन की खातिर
लिखते शहादत की जो कहानी
चंद लम्हों में लिपटी रात खुशी वाली
आई लिए हाथों में मेहंदी की लाली
अहले सुबह क्यों हुईं थीं आंखें काली
उत्तर इन प्रश्नों का देगा कौन?
काँटों सी चुभन लिए बातों को
सहते छलनी होते दामन को
कलियों से नर्म बेचैन इस मन को
प्रेम से भीगो देगा कौन?
हर ओर से आज उठती निगाहों में
ये सवाल है बड़ा भारी कि,
अब अमन-औ-चैन के मुल्क में,
फिर प्यार के फूल खिलाएगा कौन?
ऐसे जांबाज कौन?

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